Wednesday, July 22, 2009

खवाब ...


सपनो की चादर ओढे ,
जब आँख मीच में लेता हु..
तो अपनी ही दुनिया में करवटे लेता हूँ !
कभी इस ओर, तो कभी उस ओर ..
चाँद का झिलमिल आँचल,
और आसमान में ढेरो टिमटिमाते सितारे,
इन ढेरो सितारों में, एक तारा है मेरा..
कभी जोर से चमकता तो लगता सच होगा..
तो कही बादलो में छिप जाता , तो लगता अधूरा ही होगा..

ये कश्मकश रात भर चलती ,
कभी सपना सच लगता तो कभी अधूरा सा लगता..
इस चादर तले कई सपने देखे है मेने...
कुछ सच हुऐ..
तो कई कुचले है मैने..
सपनो की हकीक़त समझता नहीं हूँ ,
इसीलिए रोज़ एक ख़ाब बुन लेता हु..
अपनी सपनो की चादर रोज़ ओढ़ लेता हु..
की शायद कभी.. कही किसी रोज़,
इन बादलो की रुसवाई तो कम होगी..
और इन सपनो को कभी तो हकीक़त की शक्ल नसीब होगी !!

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